Thursday, 14 November 2013

ये अंधेरा कैसे मिटे , तू ही बता ऐ आसमाँ ,

Abhishek Dubey

रोशनी के दुश्मन चौकीदार नज़र आते है

हर गली में, हर सड़क पे ,मौन पड़ी है ज़िंदगी

हर जगह मरघट से हालात नज़र आते है

सुनता है आज कौन द्रौपदी की चीख़ को हर

जगह दुस्साशन सिपहसालार नज़र आते है

सत्ता से समझौता करके बिक गयी है लेखनी

ख़बरों को सिर्फ अब बाज़ार नज़र आते है

सच का साथ देना भी बन गया है जुर्म अब

सच्चे ही आज गुनाहगार नज़र आते है

मुल्क की हिफाज़त सौंपी है जिनके हाथों मे

वे ही हुकुमशाह आज गद्दार नज़र आते है

खंड खंड मे खंडित भारत रो रहा है ज़ोरों से

हर जाति , हर धर्म के, ठेकेदार नज़र आते है

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